भारत के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य अब केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक विषय नहीं रह गया है। अकादमिक दबाव, रोजगार की चिंता, आर्थिक परेशानी, सामाजिक भेदभाव और अकेलेपन जैसी समस्याओं को संस्थागत स्तर पर समझने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसी दिशा में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स ने Student Mental Health पर अपनी अंतरिम रिपोर्ट जारी की है।
रिपोर्ट में केवल विद्यार्थियों की मानसिक परेशानियों का उल्लेख नहीं किया गया, बल्कि उच्च शिक्षण संस्थानों की व्यवस्था, काउंसलिंग सेवाओं, छात्रवृत्ति में देरी, शिकायत निवारण और शिक्षकों के व्यवहार जैसे विषयों की भी समीक्षा की गई है। इसके निष्कर्ष संकेत देते हैं कि आने वाले समय में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को Student Mental Health के लिए अधिक जवाबदेह व्यवस्था बनानी पड़ सकती है।
Student Mental Health के लिए राष्ट्रीय टास्क फोर्स क्यों बनाई गई?
सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च 2025 को उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों की आत्महत्या और मानसिक परेशानी की बढ़ती घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। इसके बाद न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एस. रवींद्र भट की अध्यक्षता में राष्ट्रीय टास्क फोर्स गठित की गई।
इस टास्क फोर्स में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, कानून विशेषज्ञों, सामाजिक विज्ञान से जुड़े विद्वानों और विभिन्न सरकारी विभागों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों की समस्याओं के मूल कारणों की पहचान करना और उन्हें रोकने के लिए व्यावहारिक उपाय सुझाना है।
राष्ट्रीय टास्क फोर्स की आधिकारिक अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार, विद्यार्थियों की परेशानी को केवल उनकी व्यक्तिगत कमजोरी या तनाव सहने की क्षमता से जोड़ना उचित नहीं है। शिक्षण संस्थान का वातावरण, अकादमिक प्रणाली और प्रशासनिक व्यवहार भी Student Mental Health को प्रभावित करते हैं।
Student Mental Health Report में सामने आए चिंताजनक आँकड़े
रिपोर्ट तैयार करने के लिए विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों, मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और उच्च शिक्षण संस्थानों से जानकारी जुटाई गई। विद्यार्थी सर्वेक्षण में लगभग 2.43 लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया, हालांकि रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नमूना पूरे देश का समान प्रतिनिधित्व नहीं करता। इसलिए परिणामों को प्रारंभिक माना जाना चाहिए।
प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं:
| रिपोर्ट का संकेत | प्रारंभिक आँकड़ा |
|---|---|
| परिसर में स्वयं को कुछ हद तक बाहरी महसूस करने वाले विद्यार्थी | लगभग 34% |
| काउंसलिंग सुविधा उपलब्ध नहीं होने की जानकारी देने वाले विद्यार्थी | लगभग 32% |
| काउंसलिंग सुविधा की जानकारी न रखने वाले विद्यार्थी | लगभग 26% |
| पिछले छह महीनों में लंबे समय तक अत्यधिक तनाव या चिंता अनुभव करने वाले | लगभग 15% |
| एक या अधिक आत्महत्या की सूचना देने वाले संस्थान | 56 |
| पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के बिना चल रहे संस्थान | 70% से अधिक |
| औपचारिक आत्महत्या-जोखिम प्रबंधन प्रोटोकॉल वाले संस्थान | 4% से कम |
रिपोर्ट के अनुसार 45 प्रतिशत संस्थानों ने पिछले 18 महीनों में शिक्षकों के लिए मानसिक स्वास्थ्य संवेदनशीलता कार्यशाला आयोजित नहीं की थी। ये आँकड़े बताते हैं कि Student Mental Health के लिए केवल हेल्पलाइन जारी करना पर्याप्त नहीं होगा।

Student Mental Health पर असर डालने वाली मुख्य समस्याएँ
टास्क फोर्स ने पाया कि विद्यार्थियों का तनाव कई परस्पर जुड़ी परिस्थितियों से उत्पन्न होता है। कॉलेज में प्रवेश के बाद पढ़ाई का बढ़ा हुआ बोझ, कठोर उपस्थिति नियम, प्रतिस्पर्धा, प्लेसमेंट का दबाव और भविष्य की अनिश्चितता विद्यार्थियों को प्रभावित करती है।
कई विद्यार्थियों ने जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति और दिव्यांगता के आधार पर अलगाव या भेदभाव महसूस करने की बात भी कही। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को अंग्रेजी भाषा, शहरी जीवन और नए शैक्षणिक वातावरण में समायोजन संबंधी कठिनाइयाँ हो सकती हैं।
छात्रवृत्ति मिलने में देरी भी Student Mental Health से जुड़ी बड़ी समस्या मानी गई है। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थी फीस, छात्रावास और दैनिक खर्च को लेकर अतिरिक्त दबाव अनुभव कर सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि छात्रवृत्ति में प्रशासनिक देरी के कारण किसी विद्यार्थी को परीक्षा, कक्षाओं या छात्रावास से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
Student Mental Health Services में क्या बदलाव सुझाए गए?
राष्ट्रीय टास्क फोर्स ने कॉलेजों में प्रशिक्षित और योग्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की सेवाएँ उपलब्ध कराने की सिफारिश की है। रिपोर्ट ने यह भी कहा कि बिना उचित प्रशिक्षण के किसी शिक्षक को केवल नाम के लिए “काउंसलर” घोषित नहीं किया जाना चाहिए।
कैंपस में निम्न व्यवस्थाएँ विकसित करने का सुझाव दिया गया है:
- योग्य मनोवैज्ञानिकों और मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की उपलब्धता।
- संकट की स्थिति के लिए स्पष्ट Standard Operating Procedure।
- सहायता लेने वाले विद्यार्थी की गोपनीयता की सुरक्षा।
- मानसिक स्वास्थ्य सेवा पर विद्यार्थियों से गुमनाम प्रतिक्रिया।
- शिक्षकों और प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण।
- जरूरत पड़ने पर नजदीकी अस्पताल या विशेषज्ञ से तत्काल संपर्क।
- मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग से जुड़ी सामाजिक झिझक कम करना।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी विद्यालयों और कॉलेजों में सामाजिक एवं भावनात्मक शिक्षण कार्यक्रमों को मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा का प्रभावी माध्यम मानता है। WHO की Mental Health जानकारी के अनुसार, शैक्षणिक वातावरण में समय पर सहायता और समुदाय आधारित सेवाएँ मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
Student Mental Health के लिए शिक्षकों की भूमिका
अधिकांश शिक्षक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ नहीं होते, इसलिए उनसे इलाज करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन वे व्यवहार, उपस्थिति, पढ़ाई और सामाजिक सहभागिता में अचानक हुए बदलाव को पहचान सकते हैं।
टास्क फोर्स ने शिक्षकों और प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए ऐसा प्रशिक्षण अनिवार्य करने का सुझाव दिया है, जिससे वे अकादमिक, आर्थिक, सामाजिक और भेदभाव से जुड़े तनाव के संकेत पहचान सकें। शिक्षक का कार्य समस्या का निदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थी को सुनना, सही सेवा तक पहुँचाना और आवश्यक संस्थागत सहायता दिलाना होना चाहिए।
Student Mental Health के लिए mentorship व्यवस्था को भी केवल विद्यार्थियों की पढ़ाई और अंकों की निगरानी तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसमें भावनात्मक समर्थन, नियमित संवाद और सकारात्मक प्रतिक्रिया शामिल होनी चाहिए।
Student Mental Health और समावेशी कैंपस की आवश्यकता
रिपोर्ट ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में अनिवार्य accessibility audit कराने की सिफारिश की है। इसका उद्देश्य दिव्यांग, ट्रांसजेंडर और दूसरे वंचित समूहों के विद्यार्थियों के लिए परिसर को अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाना है।
दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए सहायक तकनीक, सुलभ अध्ययन सामग्री, परीक्षा में उचित समायोजन, सुगम छात्रावास और शौचालय जैसी सुविधाएँ सुनिश्चित करने की बात कही गई है। अंग्रेजी भाषा में कठिनाई महसूस करने वाले विद्यार्थियों के लिए बिना कलंक वाले bridge courses भी उपयोगी हो सकते हैं।
Peer-support group, विद्यार्थी क्लब, diversity programmes और सुरक्षित संवाद स्थल कैंपस में अपनापन बढ़ा सकते हैं। हालांकि peer support किसी प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ का विकल्प नहीं है, लेकिन समय पर भावनात्मक सहारा और सही सहायता तक पहुँच बनाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

Student Mental Health Report से कॉलेजों में क्या बदल सकता है?
यह अभी अंतरिम रिपोर्ट है। टास्क फोर्स ने स्पष्ट किया है कि अंतिम रिपोर्ट तैयार होने तक कुछ सिफारिशें बदली या विस्तृत की जा सकती हैं। इसके बावजूद वर्तमान सुझाव उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए सुधार की स्पष्ट दिशा प्रस्तुत करते हैं।
इन सुझावों को लागू किए जाने पर कॉलेजों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, छात्र शिकायतों, छात्रवृत्ति भुगतान, भेदभाव, संकटकालीन सहायता और विद्यार्थियों की गोपनीयता के संबंध में लिखित व्यवस्था बनानी पड़ सकती है। संस्थानों में 24 घंटे चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराने या उसे एक किलोमीटर की दूरी के भीतर सुनिश्चित करने की भी सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट यह संदेश देती है कि Student Mental Health की जिम्मेदारी केवल विद्यार्थी या उसके परिवार पर नहीं डाली जा सकती। कॉलेजों को ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जिसमें विद्यार्थी बिना डर, शर्म या प्रशासनिक कार्रवाई की आशंका के सहायता माँग सकें।
यदि कोई विद्यार्थी लगातार अत्यधिक तनाव, निराशा या स्वयं को नुकसान पहुँचाने के विचार अनुभव कर रहा हो, तो उसे अकेला न छोड़ें। परिवार, भरोसेमंद व्यक्ति, प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या नजदीकी आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा से तत्काल सहायता प्राप्त करें।
Disclaimer: यह लेख केवल सूचनात्मक और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह, निदान या आपातकालीन चिकित्सा सहायता का विकल्प न मानें।
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