UGC New Rules: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी University Grants Commission ने वर्ष 2026 के लिए Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations लागू किए हैं। इन नियमों का घोषित उद्देश्य यह है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में किसी भी तरह के जातिगत, सामाजिक या संस्थागत भेदभाव को रोका जा सके और सभी छात्रों व कर्मचारियों को समान अवसर मिलें।
नए नियमों के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में Equal Opportunity Centre (EOC) बनाना अनिवार्य किया गया है। इसके अलावा 24×7 हेल्पलाइन, विशेष शिकायत समितियां और तय समय सीमा में कार्रवाई की व्यवस्था भी की गई है। यदि कोई संस्थान इन निर्देशों का पालन नहीं करता, तो UGC द्वारा जुर्माना या अन्य दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
UGC New Rules Protest 2026: विरोध अब कैंपस से सड़कों तक
इन नियमों के लागू होते ही विरोध शुरू हो गया। शुरुआत में छात्र और शिक्षक संगठनों ने आपत्ति जताई, लेकिन अब यह मामला प्रशासन और राजनीति तक पहुंच चुका है। 27 जनवरी को ऊंची जाति के छात्रों द्वारा UGC मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन की घोषणा के बाद यह विवाद और तेज हो गया।

दिल्ली, वाराणसी, रांची और कई अन्य शहरों में विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं। कुछ संगठनों ने तो भारत बंद और संसद घेराव तक की चेतावनी दे दी है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर लगातार अभियान चल रहा है।
छात्रों और शिक्षकों को आपत्ति क्यों है?
नए नियमों को लेकर सबसे बड़ी चिंता अस्पष्टता और दुरुपयोग की संभावना को लेकर जताई जा रही है। शिक्षकों का कहना है कि नियम इतने व्यापक हैं कि कक्षा में अनुशासन बनाए रखने के लिए कही गई सख्त बात को भी भेदभाव की श्रेणी में डाला जा सकता है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी और JNU से जुड़े शिक्षक संगठनों ने आशंका जताई है कि अगर हर डांट या अकादमिक टिप्पणी शिकायत का कारण बन गई, तो शिक्षक खुलकर पढ़ाने से हिचकेंगे। इससे पढ़ाई का माहौल प्रभावित हो सकता है।
झूठी शिकायतों पर सजा का प्रावधान क्यों बना विवाद की वजह?
UGC के ड्राफ्ट नियमों में पहले यह प्रावधान था कि अगर कोई छात्र जानबूझकर झूठी शिकायत करता पाया गया, तो उस पर जुर्माना या निलंबन हो सकता है। लेकिन अंतिम रूप से जारी नियमों में यह प्रावधान हटा दिया गया।
यही बदलाव विरोध की सबसे बड़ी वजह बना। आलोचकों का कहना है कि सजा का डर खत्म होने से झूठी शिकायतों की संख्या बढ़ सकती है और इसका सबसे ज्यादा असर शिक्षकों और सामान्य वर्ग के छात्रों पर पड़ेगा।
राजनीतिक बयानबाजी ने कैसे बढ़ाया विवाद?
इस मुद्दे पर राजनीति भी पूरी तरह सक्रिय हो चुकी है। बसपा प्रमुख Mayawati ने UGC के नए नियमों का समर्थन करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय जरूरी है, लेकिन फैसले से पहले सभी पक्षों से बातचीत होनी चाहिए थी। उन्होंने दलित-पिछड़े वर्गों से अपील की कि वे उकसावे वाली राजनीति से सावधान रहें।
देश की राजधानी दिल्ली में छात्र संगठन UGC Act का विरोध कर रहे हैं।
सवर्ण समाज के नारे सुनिए।
“छात्र एकता जिंदाबाद”#Feb1BharatBand लिखकर देश के छात्रों का समर्थन कीजिए।विशेष सूचना: 1 फरवरी को भारत बंद है। pic.twitter.com/oKApGXPYKj
— Satyajeet Mishra (@SatyajeetM72938) January 28, 2026
वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan ने कहा कि नियमों का गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा और यह पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई है। इसके उलट, कांग्रेस और शिवसेना जैसे दलों ने इन नियमों को एकतरफा बताते हुए वापस लेने या संशोधन की मांग की है।
Infosys के पूर्व CFO ने क्यों बताया नियमों को असंवैधानिक?
इंफोसिस के पूर्व CFO TV Mohandas Pai ने UGC की नई गाइडलाइंस को असंवैधानिक करार दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब भारत के कॉलेजों में करीब 4 करोड़ छात्र पढ़ते हैं, तो भेदभाव के वास्तविक मामलों की संख्या कितनी है।
पई का कहना है कि भेदभाव को केवल जातिगत नजरिए से देखने के बजाय इसे व्यापक संस्थागत और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे नियम बनाने का निर्देश नहीं दिया था, बल्कि केवल अध्ययन करने को कहा था।
UGC Protest 2026 आगे किस दिशा में जा सकता है?
फिलहाल स्थिति यह है कि सरकार आश्वासन दे रही है, लेकिन लिखित संशोधन या नियमों की वापसी को लेकर कोई ठोस घोषणा नहीं हुई है। छात्र और शिक्षक संगठन साफ कर चुके हैं कि अगर नियमों में स्पष्टता और संतुलन नहीं आया, तो आंदोलन और तेज होगा।
यह विवाद अब सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं रहा, बल्कि उच्च शिक्षा, सामाजिक न्याय और अकादमिक स्वतंत्रता से जुड़ा एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि UGC और केंद्र सरकार इस बढ़ते दबाव का क्या समाधान निकालती है।














